इस्लाम और दहेज़ प्रथा

इस्लाम और दहेज़ प्रथा
- Apr 14, 2020
- Qurban Ali
- Tuesday, 9:45 AM
इस्लाम के कानून के मुताबिक लड़की वाले दहेज़ नहीं देते, बल्कि लड़का जो शादी कर रहा है यह उसका फ़र्ज़ है क़ि अपनी पत्नी के लिए रहने का, कपडे का खाने पीने का इंतज़ाम करे। सूरा ए निसा मैं अल्लाह ने साफ़ साफ़ कहा है क़ि शादी करो और लड़की को महर (एक तय रक़म) दो। महर की रक़म तय करती है लड़की, अगर लड़की पे कम रक़म तय करने के लिए ज़ोर डाला जाए तो लड़की शादी से इनकार कर सकती है। हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा दहेज़ मैं ज्यादा रक़म ना लिया करो क्योंकी यह दोनों के बीच नफरत और दुश्मनी पैदा करती है। फातिमा (रज़ी अल्लाह तआला अन्हु) पैग़म्बर ए इस्लाम हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बेटी थी और उनकी शादी मुसलमानों के खलीफा हजरत अली (अलैहिस सलाम) से हुई। हम मुसलमानों को यह देखना चाहिए की हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दहेज़ मैं क्या दिया था या घर के सामान कहां से आये थे। जब शादी का वक़्त आया तो हजरत अली (अलैहिस सलाम) ने अपने घोड़े की जीन और एक तलवार बेच दी उससे जो रक़म मिली उसके तीन हिस्से किये गए। १) पहला हिस्सा घर मैं इस्तेमाल होने वाले सामान लाने के लिए दी गए। २) दूसरा हिस्सा शादी कि तयारी मैं खुशबू . फूल वगैरह के लिए दिया गया। ३) तीसरा हिस्सा मेहमानों के खाने पीने के इंतज़ाम के लिए दिया गया। इन तमाम बातो से ज़ाहिर होता है की इस्लाम किसी भी तरह की रक़म या सामन जिसे दहेज़ के रूप में लड़की वालो से लिया जाये ऐसे किसी भी प्रथा का समर्थन नहीं करता है। लड़की वालो से शादी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भी तोहफा लेना एक मुस्लमान के लिए किसी भी सूरत जायज़ नहीं हैं।